मुझे बड़ी आदत थी जोड़ने की
तो बस जोड़ती गई
ताउम्र बस जोड़ती ही रही
कुछ सपने बुनती ही गई सवाँरती ही गई
उम्मीद के रेशमी धागे से ख़्वाबों में क्यारियाँ लगाती ही गई
मुझे बड़ी आदत थी जोड़ने की
वो टूटे मिट्टी के बर्तनको फिर से संभालना वो सहेज के रखना
शायद था या यक़ीन था वो मेरा की हाँ अब यह नहीं बिखरेगा
पर पानी की कुछ बूँदों सेमैं हारती ही गई
मुझे बड़ी आदत थी जोड़ने की
हर बार मैं हर उधड़े कपड़े को सिलती ही गई
रफ़्फ़ु करके संभालती ही गई
शायद फिर नई सी लगे
ज़िंदगी ही तो है
ऐसा सोचती हीगई
हाथों में सुई की चुभन के निशान को छुपाती ही गई
मुझे बड़ी आदत थी जोड़ने की
तो मैं जोड़ती ही रही
आँखों में आने ना दिया इनको
आँसुओं को सीने में दबाती ही गई
ज़ख़्मों को मरहम लगती ही गई
तिनकोंको जोड़ जोड़ के घोंसला बनती
ही गई
उड़ने को पंख भी दिए हैं क़ुदरत ने मुझे
इस सच को झुठलाती हीगई
मुझे बड़ी आदत है जोड़ने की